*Big breaking jashpur:-भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ी ‘विकास की राह’: जशपुर में 2.86 करोड़ की सड़क में ‘मिट्टी’ का खेल, समय सीमा बीती पर काम अधूरा. !*

​जशपुरनगर:-जिले के सुदूर जनजातीय क्षेत्रों को मुख्यधारा से जोड़ने के दावे कागजों पर तो सुनहरे दिखते हैं, लेकिन धरातल पर इनकी हकीकत ‘मिट्टी’ में मिली हुई है। लोधेनापाठ से लंरगापाठ तक बनने वाली 4.4 किलोमीटर लंबी सड़क इसका जीता-जागता प्रमाण है। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) के तहत बन रही इस सड़क ने निर्माण के मानकों और विभागीय पारदर्शिता की धज्जियां उड़ा दी हैं।
​समय का तकाजा: एक साल की देरी और फिर भी ‘अधूरा’ सफ़र
​इस परियोजना की नींव 12 मार्च 2024 को रखी गई थी, जिसे 26 मार्च 2025 तक पूर्ण कर ग्रामीणों को समर्पित किया जाना था। आज फरवरी 2026 बीत रहा है—यानी समय सीमा खत्म हुए करीब एक साल होने को है—लेकिन सड़क की स्थिति बदहाल है। 192 जनजातीय ग्रामीणों के लिए यह सड़क जीवनरेखा है, जो अब उनके लिए अंतहीन प्रतीक्षा का कारण बन गई है।
गुणवत्ता से खिलवाड़: गिट्टी के साथ मिट्टी का ‘अवैध संगम’
​23 फरवरी 2026 को हुए स्थल निरीक्षण में जो तस्वीरें सामने आईं, वे तकनीकी मानकों को ठेंगा दिखाती हैं।
​मानक प्रक्रिया: नियमानुसार गिट्टी में डस्ट का नियंत्रित मिश्रण कर, पानी के साथ विधिवत रोलिंग होनी चाहिए।
​मौके की हकीकत: सड़क पर गिट्टी के साथ सीधे मिट्टी बिछाई जा रही है। ऊपर से डस्ट का छिड़काव कर इसे ‘फिनिशिंग’ देने की कोशिश की जा रही है।
​विशेषज्ञों की राय: यदि सड़क की बुनियाद में मिट्टी का उपयोग इस तरह किया जाए, तो पहली बारिश में ही सड़क का ‘धंसना’ और ‘उखड़ना’ तय है। यह निर्माण नहीं, बल्कि सरकारी खजाने की खुली लूट है।
​मौन साधे बैठा विभाग: जिम्मेदारी से बचते अधिकारी
​इतनी बड़ी अनियमितता के बावजूद विभाग का कोई जिम्मेदार अधिकारी मौके पर मौजूद नहीं मिला। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) के कार्यपालन अभियंता संतोष नाग की ओर से अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आना, विभाग की कार्यप्रणाली पर गहरा संदेह पैदा करता है।
प्रमुख बिंदु: एक नजर में
विवरण तथ्य
परियोजना का नाम लोधेनापाठ से लंरगापाठ मार्ग
कुल लागत ₹286.52 लाख (2.86 करोड़)
कुल लंबाई 4.4 किलोमीटर
लक्ष्य तिथि 26 मार्च 2025
वर्तमान स्थिति समय सीमा के 11 माह बाद भी कार्य अधूरा और गुणवत्ताहीन।
न्याय की गुहार: क्या होगी कार्रवाई?
​यह केवल तकनीकी चूक नहीं, बल्कि उस जनजातीय आबादी के साथ अन्याय है जो वर्षों से एक पक्की सड़क का सपना देख रही है। 2.86 करोड़ रुपये की इस योजना में यदि गुणवत्ता सुनिश्चित नहीं की गई, तो यह राशि पहली बारिश के साथ ही बह जाएगी।
​मांगें जो उठ रही हैं:
​तत्काल प्रभाव से स्वतंत्र तकनीकी टीम द्वारा निर्माण की जांच।
​दोषी ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट करने की प्रक्रिया।
​संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय कर उन पर दंडात्मक कार्रवाई।