*महाघोटाला? कागजों पर ‘सफेदा’, नियमों को ‘ठेंगा’ और रातों-रात नदी की कौड़ी वाली जमीन बन गई सोने की खान!​जशपुर में राजस्व का सबसे बड़ा खेल: कलेक्टर ने जिस दावे को ‘अमान्य’ किया, कमिश्नर कोर्ट से उसे मिली हरी झंडी; हाईवे किनारे करोड़ों की सरकारी जमीन पर रसूखदारों का ‘कब्जा’*

​जशपुर ब्यूरो। छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले से राजस्व विभाग, पंचायत रिकॉर्ड और प्रशासनिक फैसलों को कटघरे में खड़ा करने वाला एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है। आरोप है कि नदी किनारे की कौड़ियों के भाव वाली जमीन को कागजों में ‘जादूगरी’ करके गायब दिखाया गया और फिर मुआवजे के नाम पर स्टेट हाईवे के किनारे स्थित करोड़ों रुपए की बेशकीमती व्यावसायिक जमीन पर कब्जा जमा लिया गया।
​यह पूरा मामला अब सिर्फ जमीन के लेन-देन का नहीं, बल्कि सिस्टम के भीतर बैठे रसूखदारों और रक्षक ही भक्षक बनने की कहानी बयां कर रहा है।

*खेल की शुरुआत: 7 लाख की जमीन पर ‘करोड़ों’ का दांव..!*


​118 पन्नों के आधिकारिक दस्तावेजों से जो कहानी निकलकर सामने आ रही है, वह किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं है:
​तारीख – 1 जून 2012: सेठ ओम प्रकाश अग्रवाल नाम के एक व्यवसायी ने राजेंद्र प्रसाद, अवधेश कुमार और सुमित्रा सिंह से खसरा नंबर 100/2 की जमीन महज 7 लाख 23 हजार रुपए में खरीदी।
​जमीन की हकीकत: स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, यह जमीन पहले से ही पूरी तरह नदी क्षेत्र (डूबान) में थी और इसकी कीमत न के बराबर थी।
​दावे का पेंच: बाद में कागजों पर यह दावा ठोंक दिया गया कि खरीदी गई जमीन का एक बड़ा हिस्सा नदी में समाहित (कटान) हो चुका है, इसलिए इसके बदले शासन दूसरी जमीन दे। जबकि ग्रामीणों का साफ कहना है कि नदी में डूबी जमीन एकड़ में नहीं, बल्कि कुछ डिसमिल में थी।


*सबसे बड़ा सवाल: ‘नदी किनारे’ के बदले ‘हाईवे किनारे’ की मलाई क्यों?*

​राजस्व विभाग के नियम बेहद स्पष्ट और कड़े हैं। नियम कहते हैं कि ​नदी में समाहित हुई जमीन के बदले वैकल्पिक सरकारी जमीन तभी दी जा सकती है, जब पीड़ित व्यक्ति भूमिहीन हो चुका हो या उसके पास गुजर-बसर और खेती के लिए कोई दूसरा साधन न बचा हो।

*​यहाँ नियमों की धज्जियां कैसे उड़ीं, इसके तीन बड़े प्रमाण देखिए:-*

​क्या सेठ ओम प्रकाश अग्रवाल कोई गरीब या भूमिहीन किसान हैं, जिनके पास आजीविका का कोई साधन नहीं था?

​अगर जमीन का कुछ हिस्सा नदी में गया भी था, तो उसके बदले उसी स्तर की सामान्य जमीन देने के बजाय स्टेट हाईवे से लगी करोड़ों की व्यावसायिक जमीन क्यों परोस दी गई?
​कौड़ियों के दाम वाली डूबान जमीन के बदले ‘सोने की खान’ जैसी प्राइम लोकेशन की जमीन का आवंटन किसके इशारे पर हुआ?

*कलेक्टर की ‘नो’ के बाद कमिश्नर की ‘यस’ पर उठे गंभीर सवाल??*

​इस पूरे खेल में सबसे बड़ा प्रशासनिक विरोधाभास साल 2023-2024 के दौरान देखने को मिला:
​कलेक्टर कोर्ट का कड़ा रुख (2023): यह मामला सबसे पहले जशपुर कलेक्टर की अदालत में पहुंचा था। कलेक्टर ने छत्तीसगढ़ शासन, राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग के 21 अक्टूबर 2025 के कड़े प्रावधानों और नियमों का बारीकी से अध्ययन किया। उन्होंने साफ माना कि यह आवेदन नियमों के दायरे में कहीं नहीं टिकता, और इसे “विचारणीय एवं प्रचलन योग्य नहीं” मानते हुए सिरे से खारिज (निरस्त) कर दिया।
​कमिश्नर कोर्ट का ‘चमत्कार’: कलेक्टर कोर्ट से झटका लगने के बाद मामला कमिश्नर कोर्ट पहुंचा। और यहीं से पूरा खेल पलट गया। कमिश्नर कोर्ट ने कलेक्टर के आदेश को दरकिनार करते हुए सेठ ओम प्रकाश अग्रवाल के पक्ष में फैसला सुना दिया।
​अब जनता और कानून के जानकार यह पूछ रहे हैं कि जो नियम और हेराफेरी जशपुर कलेक्टर को साफ-साफ दिखाई दे रही थी, क्या वो कमिश्नर कोर्ट की फाइलों में अचानक धुंधली हो गई?


*पंचायत की बैठक पंजी में ‘सफेदा’ और ‘काटछांट’ का काला खेल..!*

​इस महाघोटाले की नींव बगीचा जनपद क्षेत्र की बिमड़ा पंचायत में रखी गई थी। 19 जून 2023 की पंचायत बैठक की जो मूल पंजी (रजिस्टर) है, उसकी तस्वीरें और रिकॉर्ड्स चौंकाने वाले हैं:
​प्रस्तावों और प्रस्ताव संख्या में जगह-जगह फ्लूइड (सफेदा) लगाया गया है।


​लिखावट के ऊपर ओवरराइटिंग की गई है और शब्दों को काटा गया है।
​आरोप है कि पंचायत के कुछ पदाधिकारियों को प्रभाव में लेकर रातों-रात बैकडेट में प्रस्ताव तैयार किए गए ताकि कमिश्नर कोर्ट में इसे मजबूत आधार के रूप में पेश किया जा सके।

*मुख्यमंत्री तक पहुंची शिकायत,अब निष्पक्ष जांच का इंतजार!*

​यह मामला उजागर होने के बाद स्थानीय ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं में भारी आक्रोश है। सूबे के मुख्यमंत्री सहित राजस्व विभाग के आला अधिकारियों को सबूतों के साथ लिखित शिकायत भेज दी गई है।
*​जनता के तीखे सवाल??*
​क्या पंचायत के संदिग्ध और कटे-फटे रिकॉर्ड की फॉरेंसिक जांच होगी?
​क्या कलेक्टर के आदेश को पलटने वाले कमिश्नर कोर्ट के फैसले का दोबारा विधिक परीक्षण कराया जाएगा?
​क्या सरकार इस बेशकीमती सरकारी जमीन के आवंटन को निरस्त कर भू-माफियाओं और भ्रष्ट अफसरों पर बुलडोजर चलाएगी?
​यह मामला अब सिर्फ एक जमीन के टुकड़े का नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक पारदर्शिता और ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति की परीक्षा बन चुका है। देखना होगा कि शासन इस पर त्वरित कड़ा एक्शन लेता है या फिर करोड़ों का यह खेल फाइलों की धूल में दबा दिया जाएगा।